सुमिरूँ माता सरस्वती नै ,
अर हाथ जोड़ गणपतिवन्दन ।
गीता ज्ञान मंडावो म्हँसूँ ,
मायड़ भासा बिना बिघन ।
म्हारी कलम कदै न थमः।
तस्मै श्री गुरूवै नमः।
जनम का आंधा धृतराष्ट्र जी ,
म्हाभारत देखण चावै ।
वेद व्यास जी दी दृष्टितो,
संजय या गाथा गावै ।
धृतराष्ट्र उवाच-
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥1-1॥
भावार्थ : धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1-1॥
धृतराष्ट्र जी बोल्या –
धरम छेत्र छै कुरुछेत्र ज्याँ,
सेना दळ बादळ छाई ।
म्हारा अर पांडू पुतरां नै ,
काँई कर् यो बतळा भाई । ॥1-1॥

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