जैविक खेती आज की आवश्यकता- सोलंकी
परम्परागत खेती से प्राप्त उत्पाद स्वास्थ्य के लिए लाभदायक- सोलंकी
रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से बचे- सोलंकी
दूनी/टोंक(हरि शंकर माली) – स्थानीय सहायक निदेशक सभागार में परम्परागत कृषि विकास योजनार्न्तगत कृषक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया जिसमें कृषकों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड में की गई सिफारिश के अनुसार उर्वरक प्रयोग करने की सलाह दी गई।
कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक वीरेन्द्र सिंह सोलंकी ने कहा कि परम्परागत खेती आज के समय कि आवश्यकता है अंधाधुन्ध उर्वरक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरा क्षमता कमजोर होती है, साथ ही मानव स्वास्थय पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है,अतः किसान अपनी मृदा की जांच प्रयोगशाला में कराये एवं कृषि वैज्ञानिको की सिफारिश के अनुसार ही उर्वरक प्रयोग करें, मिट्टी एवं पानी की जांच मात्र 5 रुपये शुल्क निर्धारित है, संतुलित उर्वरक उपयोग से मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है एवं उत्पादन क्षमता भी बनी रहती है।
सहायक निदेशक बाबू लाल यादव ने कहा कि कृषि विभाग की कई प्रकार की योजनाएं हैं जिनका किसान ऑनलाइन आवेदन कर लाभ उठा सकते हैं सरसो की फसलों में यदि किसी रोग का प्रकोप दिखाई दे कृषि विभाग के कृषि पर्यवेक्षक एवं सहायक कृषि अधिकारी से संपर्क कर सलाह ले सकते है,
सहायक निदेशक मुख्यालय दुर्गा शंकर कुम्हार ने जैविक खेती पर व्याख्यान देते हुए करा कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती आवश्यक है, कृषक अधिक से अधिक जैविक उत्पादन करे एवं प्रमाणीकरण संस्था से प्रमाण पत्र लेने पर मूल्य मी अधिक मिलता है।
कृषि अधिकारी कजोड़ मल गुर्जर ने रबी फसलो में प्रमुख कीट एवं व्याधियों के लक्षण एवं नियन्त्रण पर जानकारी दी। इस अवसर पर मधुमक्खी उत्कृष्ठता केन्द्र के उपनिदेशक डा. फतेह सैनी ने कृषि फसलों में हानिकारक कीटों का प्राकृतिक विधियों से नियन्त्रण एवं कृषि विश्व विद्यालय कोटा के सेवा निवृत प्रोफेसर डा. रतन लाल सुवालका ने जैविक खाद का निर्माण एवं जैविक कीट नियन्त्रण पर व्याख्यान दिया।
इस अवसर पर सहायक कृषि अधिकारी रामावतार उपाध्याय,कृषि पर्यवेक्षक गैरोली शंकर लाल बैरवा, रेखा गुर्जर कृषि पर्यवेक्षक घाड, भगवान मीणा चांदसिंह पुरा, मुकेश खींची चांदली, रामफूल गुर्जर, बिरधी चन्द कुमावत, प्रहलाद धाकड़, मानसिंह मीणा, रमेश बैरवा सहित अनेक प्रगतिशील कृषक मौजूद थे।
