बूंदी ( नीरज गौड़ ) – नैनवां उपखण्ड के समीधी गांव में प्रस्तावित हरिकंवर गौशाला में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पंचम सोपान में कथा व्यास प्रेम नारायण जी ने कहा कि संसार में हम जो भी करें भगवान की प्रसन्नता के लिए करें। अपने लिए कभी , कहीं भी , कुछ भी नहीं करना है। यदि जीवन में थोड़ी सी सावधानी रखें तो बड़ी उपलब्धि प्राप्त हो सकती है । जो साधक अपने लिए कुछ नहीं करता है वह पराये घर से अपने घर पहुंच जाता है । भगवान के घर पहुंच जाता है। भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि उन्होने अपने लिए कभी कुछ नहीं किया । जो कुछ भी किया गाय , गरीब , कन्या और भक्तों के लिए किया। अपने लिए कुछ भी करना बंधन है तो दूसरों के लिए सब कुछ करना मुक्ति है। धन शुद्धि के लिए दान , तन शुद्धि के लिए स्नान , शरीर के निर्वाह के लिए भोजन व बुद्धि की बुद्धि के लिए भजन करने की आवश्यकता है पर भगवान को पाने के लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है केवल लगन की आवश्यकता है । मैं भगवान का हूं यह मानना क्रिया नहीं है ,स्वीकार करना मात्र है। ऐसा भक्त सब कुछ करते हुए भी निष्क्रिय हो जाता है। हर क्रिया का आरंभ भी है तो अंत भी है। अंत वाली चीज से अनंत को नहीं पाया जा सकता । जीव अनंत है जिससे अनंत को पाया जा सकता है। शरीर प्रकृति का है जो प्रकृति में मिल जाएगा पर जीव भगवान का है जो भगवान से मिलकर रहेगा। दुनिया के लिए करना कर्म योग है। कर्ता भाव नहीं रखकर कर्म करना ज्ञान योग है। भगवान के लिए करना भक्ति योग है। जीवन में अपने लिए कुछ नहीं करोगे और सब कुछ भगवान के लिए करोगे तो भगवान से प्रेम बढ़ेगा। अपनापन बढ़ेगा। सत्संग का महत्व बताते हुए कहा कि जब एक छोटा सा पाना बड़ी से बड़ी मशीन को खोल सकता है तो सत्संग के सूत्र भी जीवन की सभी परेशानियों का हल निकाल सकते हैं। छाया में बैठो और पसीना न सूखे ऐसा हो ही नहीं सकता इसी प्रकार सत्संग में आकर बैठो ओर जीवन की व्यथा नहीं मिटे ऐसा कभी नहीं हो सकता। सत्संग करने से जीव को शांति मिलती है। वह सुखी हो जाता है।
