बूंदी / नैनवां ( नीरज गौड़ ) – उपखंड के समीधी गांव निवासी जयेन्द्र सिंह हाडा ने अपनी माताजी श्रीमती हरिकंवर के नाम से गौ सेवा का संकल्प लेकर चावण्डपुरा व समीधी के बीच मुख्य मार्ग पर स्थित अपनी खातेदारी की साढे चार बीघा जमीन हरिकंवर गौ सेवा समिति समीधी को गौशाला संचालित करने के लिए प्रदान कर गौ सेवा के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखा है। गौशाला संचालित करने के लिए प्रदान की गई इसी भूमि पर गौ सेवा सहायतार्थ श्रीमद् भागवत कथा का अनुपम आयोजन चल रहा है। भागवत कथामृत की वर्षा करने वाले , गौ सेवक संत कथा व्यास श्री प्रेम नारायण जी ने षष्टम सोपान में ब्रह्म विद्या का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि परमात्मा है और संसार नहीं है । जो नहीं है वह है जैसा लग रहा है इसे ही अज्ञान कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण और बलराम ने गुरु सांदीपनी के आश्रम में गुरु की सेवा कर इसी ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त किया। इसी ज्ञान को भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता के रूप में अर्जुन को प्रदान कर सारे संसार का कल्याण किया। जीव और ब्रह्म की एकता के बारे में बताते हुए कहा कि इस मानव शरीर की महिमा सत्संग करके भगवान को प्राप्त करने से है। सत्संग से विवेक जागृत होता है। सत्य का बोध होता है ।सत्य ही परमात्मा है ।सत्य ही धर्म है। इसीलिए संतों ने मानव जीवन को देव दुर्लभ एवं इस मनुष्य शरीर को कंचन काया कहा है। शरणागति के बारे में समझाते हुए कहा कि मैं भगवान का हूं। मेरी अपनी कोई इच्छा नहीं है। भगवान की इच्छा ही मेरी इच्छा है। वह जहां और जिस परिस्थिति में रखेंगे मैं हमेशा खुश रहकर उनके बनाए संसार की सेवा करता रहूंगा। मैं जैसा भी हूं भगवान का हूं।यही शरणागति है। भगवान की शरणागति मिलने पर भक्त की समस्त जिम्मेदारी भगवान की हो जाती है। उसकी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं रह जाती।। गोपी भाव में प्रेम की परिभाषा बताते हुए कहा कि सबसे ऊंची प्रेम सगाई है। भगवान ही मेरे हैं यही प्रेम है। मींरा जी ने एवं ब्रज की भोलीभाली गोपियों ने इसी प्रेम पाश में बंधकर भगवान कृष्ण को पाया है। गोपियों को कृष्ण से हटकर कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। वह जो कुछ भी करती कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही किया करती थी इसी प्रेम के बल पर गोपियों ने कृष्ण को पा लिया।
